प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत फील्ड विजिट

प्रशिक्षण और उसका अभ्यास ही हमें कार्यों में निपुण बनाता है- कुलपति प्रो अमेरिका सिंह सुविवि के प्राणी शास्त्र विभाग के रूसा 2.0 केरियर हब के तहत चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम के पांचवें दिन प्रशिक्षणार्थियों को जयसमन्द झील के निकट स्थित वीरपुरा गांव एवम केवड़ा नाल के पास पालाघाटी गांव में जाकर सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण की तकनीकी बारीकियों का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। कुलपति प्रो अमेरिका सिंह ने प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए विभाग एवं परीक्षार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि किसी भी कार्य का प्रशिक्षण व्यक्ति को बहुत आवश्यक है और विज्ञान के क्षेत्र में यह और भी अधिक जरूरी हो जाता है। समन्वयक एवम विभागाध्यक्ष प्रो आरती प्रसाद ने बताया कि प्रशिक्षणार्थियों को फील्ड में जाकर कार्य करने का प्रशिक्षण देने हेतु प्रशिक्षणार्थियों के साथ इन दो गांवो का सर्वेक्षण भी किया गया। सर्वेक्षण के दौरान गुजरात राज्य के पूर्व स्टेट किटविज्ञानी एवम वाहक जनित रोग विशेषज्ञ डॉ पी टी जोशी ने रोग वाहक मच्छरों एवम अन्य कीटो के सर्वेक्षण की विधि के बारे में बताया तथा फील्ड में उन्हें संग्रहित करके उनकी पहचान करना तथा उन्हें संरक्षित करने की विधियो के बारे में विस्तार से समझाया। इस दौरान पायरेथ्रम स्पेस स्प्रेशीट विधि द्वारा मच्छरों को संग्रहीत करने की विधि को प्रायोगिक तरीके से बताया। विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. पी एस राजपूत ने बताया कि फील्ड में जाकर मलेरिया, डेंगू एवम चिकनगुनिया रोग वाहक मच्छरों के संग्रहण एवम पहचान की विधि बताने के साथ ही प्रशिक्षणार्थियों को गांव के लोगो से बातचीत करने, लोगो को जागरूक करने के तरीकों तथा इन बीमारियों की अधिकता होने पर आंकड़ो को संग्रहित करने के तरीकों के बारे में प्रयोगिक रूप से अवगत करवाया गया जिससे कि निकट भविष्य में इस तरह की वाहक जनित बीमारी की अधिकता होने पर ये प्रशिक्षणार्थि देश के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन बन सके तथा देश को इन बीमारियों से बचाने में सहायक सिद्ध होंगे। प्रो प्रसाद ने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान मलेरिया रोग वाहक मच्छर एनोफिलीज क्यूलिसिफेसिज एवम संदेहास्पद वाहक एनोफिलीज एन्युलेरिस अधिकता से मिले जोकि इन गांवों में मलेरिया के फैलने के खतरे को इंगित करता है। सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि ग्रामीणों को कीटनाशी उपचारित मच्छरदानी का वितरण तो किया गया था किंतु लोगो में इसके उपयोग करने के बारे में जागरूकता नही होने के कारण, लोग इसका उपयोग घर का सामना भरने में करते पाए गए। प्रो प्रसाद ने कहां कि यदि चिकित्सा विभाग प्राणी शास्त्र विभाग के द्वारा संग्रहित आंकड़ों का उपयोग करे तो वाहक जनित बीमारियो को फैलने से पहले ही सिर्फ जागरूकता के माध्यम से ही रोका जा सकता है एवम प्राणी शास्त्र विभाग चिकित्सा विभाग की हर सम्भव सहायता करने के लिए हमेशा तत्पर रहेगा।
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Last Updated on : 20/07/24